डॉ प्यारेलाल की प्रथम स्मृति दिवस पर श्रद्धांजलि व वैचारिक कार्यक्रम आयोजित
स्मारिका व पुस्तक का लोकार्पण और साम्राज्यवाद और मानसिक नियंत्रण का तंत्र” पर परिचर्चा
रुद्रपुर। पंतनगर विश्वविद्यालय के पूर्व प्राध्यापक डॉक्टर प्यारेलाल के स्मृति शेष होने की पहली वार्षिकी पर नगर निगम सभागार में श्रद्धांजलि व वैचारिक कार्यक्रम आयोजित हुआ। इस दौरान एक ‘स्मारिका’ एक अभूतपूर्व समय,अंधेरे का दौर और एक जनपक्षधर बुद्धिजीवी का जीवन तथा कृषि और खाद्यान्न केंद्रित लेख और अनुवाद ‘भूख और मुनाफे की नूराकुश्ती’ का लोकार्पण हुआ। साथ ही “साम्राज्यवाद और मानसिक नियंत्रण का तंत्र” विषय पर सारगर्भित परिचर्चा हुई। वरिष्ठ कवि बाली सिंह चीमा ने नज़्म प्रस्तुत किए। श्रद्धांजलि देते हुए वक्ताओं ने कहा कि डॉ. प्यारेलाल मानवीय संवेदना से लबरेज, कर्तव्यनिष्ठ, ईमानदार, एक प्यारे कॉमरेड थे। उनका अध्ययन अगाध, जिज्ञासा असीम और मार्क्सवादी निष्ठा अटूट थी। गोविन्द बल्लभ पन्त कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय में प्राध्यापक के रूप में कृषि क्षेत्र में अहम शोध किए। उनका सामाजिक परिवर्तन की जद्दोजहद से लगभग चार दशक का जुड़ाव, उनकी जिजीविषा और उनका योगदान हम सबके लिए प्रेरणास्पद है। उन्होंने महत्वपूर्ण लेखन और तमाम ज़रूरी लेखों-किताबों का अनुवाद किया। लंबी बीमारी से जूझते हुए उनका 6 दिसंबर 2024 को दुखद निधन हो गया था। “साम्राज्यवाद और मानसिक नियंत्रण का तंत्र” विषय पर चर्चा की शुरुआत करते हुए प्रोफेसर भूपेश कुमार सिंह ने कहा कि दुनिया को अपने नियंत्रण में लेने के लिए अमेरिकी साम्राज्यवाद ने तीन गतिविधियों – पूँजी निवेश का विस्तार, भारी सैन्य व्यय व विदेशी सहायता कार्यक्रम – को प्रमुख हथियार के रूप में प्रयुक्त किया। कहा कि आज विचारों के नियंत्रण तंत्र एक जन सम्पर्क उद्योग का रूप ले चुका है जो जनता के मस्तिष्क को अपने अनुरूप ढ़ालने के लिए मनोवैज्ञानिक कौशल के बादशाह बन चुके हैं। इसके लिए शिक्षा, धर्मोपदेश, विज्ञापन, मीडिया, राजनीति आदि अनेक तरीके इस्तेमाल होते हैं।वक्ताओं ने भारतीय समाज की मौजूद स्थिति को बताते हुए कहा कि कैसे भारत में जनविरोधी नव उदारवादी नीतियाँ लागू होने के साथ संकट गहराता गया, ज़िंदगी बेहाल होती गई और धर्म-राष्ट्रीयता, मंदिर-मस्जिद, गोरक्षा, लबजेहाद, धर्मांतरण, मॉब लिंचिंग,कश्मीर-पाकिस्तान-चीन आदि के शोर में निजीकरण-छंटनी-बंदी, विकराल रूप लेती बेरोजगारी, भयावह महँगाई जैसे असल मुद्दे गायब होते गए। जनता को गुमराह करने के नए अस्त्र विकसित हुए जो नफ़रत फैलाने में सिद्धहस्त होते गए और लंपटता व उन्माद चरम पर पहुँच गया। मदन पांडेय ने कहा कि आज पूँजीवाद की ताकत उसके पास उपलब्ध तकनीकी, मानसिक और सामाजिक उपकरणों के समुच्चय के रूप में है। प्यारेलाल जी अपने अंतिम समय तक इस बात से जूझ रहे थे कि क्यों साम्राज्यवादी लूट तंत्र बेलगाम है।कार्यक्रम का संचालन प्रोफेसर राजेश प्रताप सिंह ने किया। इस अवसर पर गार्गी प्रकाशन और द बुक ट्री की ओर से किताबों की प्रदर्शनी भी लगी। इस दौरान मुकुल समेत अन्य लोग मौजूद रहे।

मुकेश गुप्ता,
संपादक – ‘ऊधम सिंह नगर टाइम्स’
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